त्रिवेणी तीर्थम्
ऐसा नवग्रह शनि मंदिर जहां तेल व तिल दान से दूर होते हैं कष्ट
त्रिवेणी घाट के पास पूर्व की ओर से आ रही क्षिप्रा नदी है जो इंदौर या दक्षिण की ओर से आने वाली खान या क्षाता नदी से मिलती है तथा तीसरी नदी फाल्गु या रूप विलुप्त नदी का संगम ही त्रिवेणी कहलाता है।
शनिचरी अमावस्या पर नवग्रह मन्दिर पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं। इस स्थान का धार्मिक महत्व वर्तमान युग में बढ़ता गया है, यद्यपि पुरातन संदर्भाें में इस स्थान का विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता।
नवग्रह मंदिर क्षिप्रा नदीं के तट पर पर स्थित है। हमारे सौरमंडल के ग्रहों को समर्पित पूरे उज्जैन में यह एक अनूठा मंदिर है। ज्योतिष विद्या ने उज्जैन के आम लोगों के जीवन में हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा त्रिवेणी घाट पूरे शहर में सबसे अधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। विशेषकर अमावस्या और शनिवार के दिन मंदिर में भारी भीड़ जमा होती है। इस जगह केा स्थानीय लोगों द्वारा त्रिवेणी तीर्थम भी कहा जाता है।
यह मंदिर मुख्य शहर से केवल 6 कि.मी. दूर स्थित है और आम जनता के लिए इस पवित्र स्थान तक आने के लिए यातायात के अनेक साधन उपलब्ध है। स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि इस शहर में प्राचीन खगोलीय अध्ययन हुए थे।
भक्तों द्वारा तेल, नारियल, फूल और सिंदूर अर्पित किया जाता है। प्राचीन शनि मंदिर भी यहां का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण सम्राट विक्रमादित्य ने करवाया था। मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन को मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है। यहां अनेक विश्व प्रसिद्ध मंदिर है, जिनमें से ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर का मंदिर सबसे प्रमुख है।
नगर से थोड़ी दूर सांवेर रोड़ पर प्राचीन शनि मंदिर भी यहां का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माा उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाया था। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शनि देव के साथ-साथ अन्य नवग्रह भी विराजमान है इसलिए इसे नवग्रह मंदिर भी कहा जाता है। यहां दूर-दूर से शनि भक्त तथा शनि प्रकोप से प्रभावित लोग दर्शन करने आते है और शनि देव की स्तुति करते है। यह मंदिर क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है, जिसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। यहां से शिप्रा नदी का नजारा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है।
प्रत्येक शनिवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। शनिश्चरी अमावस्या पर तो यहां दर्शनार्थियांे का सैलाब उमड़ पड़ता है, जिसके कारण प्रशासन को यहां अतिरिक्त व्यवस्थाएं करनी पड़ती है। हजारों श्रद्धालु लंगी कतारों में लगर शनि देव के दर्शन करते है तथा तेल व काले तिल चढ़ाते है, जिससे की शनि प्रकोप कम हो। श्रद्धालु यहां अपने पुराने कपड़े तथा जूत-चप्पल छोड़ जाते है। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से उनका बुरा समय वहीं छूट जाता है।
